35 साल तक जंगलों में चलती रहीं, हमले झेले लेकिन नहीं रुकीं
बस्तर के सुदूर आदिवासी इलाकों में पिछले 35 वर्षों से एक महिला लगातार पैदल चलकर गांव-गांव पहुंचती रही। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के कठिन रास्तों, जानलेवा हमलों और तमाम चुनौतियों के बावजूद उन्होंने अपना मिशन नहीं छोड़ा। यही वजह है कि आज बस्तर की समाजसेवी डॉ. बुधरी ताती को देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया है।

545 गांवों तक पहुंचकर बदली हजारों महिलाओं की जिंदगी
डॉ. बुधरी ताती ने दंतेवाड़ा और बस्तर संभाग के दूरस्थ इलाकों में पैदल यात्रा कर 545 से अधिक गांवों तक पहुंच बनाई। इस दौरान उन्होंने महिलाओं को शिक्षा, स्वच्छता, स्वास्थ्य और स्वरोजगार के लिए प्रेरित किया। उनके प्रयासों से करीब 500 से ज्यादा महिलाएं आत्मनिर्भर बनीं और कई गांवों में सामाजिक बदलाव की नई शुरुआत हुई।
नक्सल प्रभावित इलाकों में सेवा का अनोखा अभियान
जहां सरकारी योजनाओं की पहुंच मुश्किल थी, वहां बुधरी ताती ने लोगों के बीच रहकर काम किया। उन्होंने आदिवासी महिलाओं को समूहों से जोड़कर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए। शिक्षा और जागरूकता के जरिए सामाजिक कुरीतियों को दूर करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।
हमलों और धमकियों के बावजूद नहीं डिगा हौसला
समाज सेवा के इस सफर में उन्हें कई बार विरोध और खतरों का सामना करना पड़ा। जानलेवा हमलों की आशंकाओं के बीच भी उन्होंने अपना काम जारी रखा। उनका मानना था कि यदि गांवों की महिलाओं को शिक्षित और आत्मनिर्भर बना दिया जाए तो पूरे समाज का विकास संभव है।
पद्मश्री से सम्मानित होने पर भावुक हुईं बुधरी ताती
पद्मश्री सम्मान की घोषणा के बाद बुधरी ताती ने इसे बस्तर की जनता और आदिवासी समाज का सम्मान बताया। उन्होंने कहा कि उनका जीवन समाज सेवा को समर्पित है और आगे भी वे इसी तरह लोगों के बीच रहकर काम करती रहेंगी।
बस्तर के लिए गर्व का क्षण
डॉ. बुधरी ताती की उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं बल्कि पूरे बस्तर और छत्तीसगढ़ के लिए गौरव का विषय है। वर्षों की निस्वार्थ सेवा, संघर्ष और समर्पण ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक पद्मश्री तक पहुंचाया है।









