स्वच्छ भारत मिशन के तहत महिला स्व-सहायता समूहों ने पेश की आत्मनिर्भरता की मिसाल
रायपुर। दुर्ग जिले की ग्राम पंचायत कोलिहापुरी ने यह साबित कर दिखाया है कि यदि सामुदायिक सहभागिता, जागरूकता और प्रभावी प्रबंधन हो तो कचरा भी आय का सशक्त माध्यम बन सकता है। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के तहत गांव की महिला स्व-सहायता समूहों ने प्लास्टिक कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए न केवल गांव को स्वच्छ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में भी उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ के मार्गदर्शन में मिली सफलता
यह पहल दुर्ग कलेक्टर अभिजीत सिंह और जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी बजरंग कुमार दुबे के मार्गदर्शन में संचालित की गई। प्रशासन के सहयोग और महिलाओं की सक्रिय भागीदारी से गांव में कचरा प्रबंधन को एक नई दिशा मिली है।
प्लास्टिक अपशिष्ट बना आय का जरिया
महिला समूहों ने गांव और आसपास के क्षेत्रों से प्लास्टिक कचरे का संग्रहण कर उसका पृथक्करण और वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया। इसके बाद एकत्रित प्लास्टिक को विक्रय कर महिलाओं ने 46 हजार रुपये से अधिक की आय अर्जित की। इस पहल ने यह दिखाया है कि पर्यावरण संरक्षण और रोजगार सृजन साथ-साथ चल सकते हैं।
स्वच्छता के साथ बढ़ा आत्मविश्वास
इस अभियान से गांव में स्वच्छता व्यवस्था मजबूत हुई है और प्लास्टिक कचरे के कारण होने वाले प्रदूषण में भी कमी आई है। वहीं, महिलाओं को अतिरिक्त आय का स्रोत मिलने से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है और वे आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं।
अन्य गांवों के लिए बनी प्रेरणा
कोलिहापुरी की यह सफलता अब अन्य ग्राम पंचायतों के लिए भी प्रेरणा बन रही है। स्वच्छ भारत मिशन के तहत कचरा प्रबंधन की इस मॉडल पहल को ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और स्वच्छता दोनों के प्रभावी उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण के साथ आर्थिक सशक्तिकरण
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण में भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। कोलिहापुरी की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि सही सोच और सामूहिक प्रयास से कचरे को भी संसाधन में बदला जा सकता है।










