रसरंग में मायथोलॉजी: इतिहास के पन्नों से सामने आई अनसुनी कहानी
नई दिल्ली| भारतीय पौराणिक कथाओं और प्राचीन संस्कृति में लैंगिक विविधता (Gender Diversity) कोई नया विचार नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा रही है। रसरंग की विशेष प्रस्तुति में इस विषय को पौराणिक संदर्भों और धार्मिक प्रतीकों के माध्यम से समझाने की कोशिश की गई है।
देवताओं के स्वरूप में भी दिखती है विविधता
रिपोर्ट के अनुसार भारतीय मिथकों में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहां स्त्री और पुरुष की पारंपरिक सीमाओं से परे पहचान दिखाई देती है। अर्धनारीश्वर का स्वरूप शिव और शक्ति के एकत्व का प्रतीक माना जाता है, जबकि कई अन्य पौराणिक कथाएं भी बताती हैं कि भारतीय संस्कृति में लैंगिक पहचान को केवल दो सीमाओं में नहीं देखा गया।
प्राचीन ग्रंथों से आधुनिक समाज तक चर्चा
विशेषज्ञों का मानना है कि समय के साथ समाज में सोच बदली, लेकिन प्राचीन भारतीय साहित्य, पुराणों और मिथकों में लैंगिक विविधता के अनेक संदर्भ मौजूद हैं। यही कारण है कि आज इस विषय पर फिर से चर्चा तेज हो रही है और लोग भारतीय परंपरा को नए नजरिए से समझने की कोशिश कर रहे हैं।
इतिहास का ऐसा पहलू जो कम ही लोगों को पता
रसरंग की यह प्रस्तुति बताती है कि भारतीय संस्कृति केवल परंपराओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसमें विविधता और स्वीकार्यता के कई आयाम भी शामिल रहे हैं। यह विषय आज के सामाजिक विमर्श के बीच इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह इतिहास और वर्तमान के बीच एक नया संवाद स्थापित करता है।










