कस्टडी डेथ मामले में FIR दर्ज करने में ढाई साल की देरी पर कोर्ट सख्त, DGP की कार्यशैली पर भी उठे सवाल
दिल्ली। पुलिस हिरासत में हुई मौत के एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर नाराजगी जताई है। अदालत ने एफआईआर दर्ज करने में हुई लंबी देरी और जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए राज्य पुलिस प्रशासन से जवाब मांगा है। सुनवाई के दौरान पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम की कार्यशैली पर भी न्यायालय ने तीखी टिप्पणी की।
2024 की घटना, 2026 में दर्ज हुई FIR
यह मामला बिलासपुर जिले में वर्ष 2024 में हुई कथित कस्टडी डेथ से जुड़ा है। मृतक की पत्नी और उनकी दो नाबालिग बेटियों ने सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल कर आरोप लगाया है कि पुलिस हिरासत में कथित प्रताड़ना के चलते उनके पति और पिता की मौत हुई। याचिका में मामले की निष्पक्ष जांच और उचित मुआवजे की मांग की गई है।
FIR में ढाई साल की देरी पर अदालत सख्त
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के समक्ष बताया गया कि घटना जनवरी 2024 की है, जबकि मामले में एफआईआर करीब ढाई वर्ष बाद 30 जुलाई 2026 को दर्ज की गई। इतनी लंबी देरी को लेकर अदालत ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन से कड़ा जवाब मांगा।
पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर उसे राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर चिंता है। अदालत ने मामले की जांच में हुई देरी और अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। अब राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को अदालत के समक्ष अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।
कस्टडी डेथ मामले में निष्पक्ष जांच की मांग
याचिकाकर्ताओं की ओर से मामले में निष्पक्ष और प्रभावी जांच की मांग की गई है। साथ ही परिवार के लिए उचित मुआवजे की मांग भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी गई है। मामले की अगली सुनवाई में राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन की ओर से दिए जाने वाले जवाब पर नजर रहेगी।








