NCERT ने कक्षा 9वीं के नए सिलेबस में जोड़ा 1975-77 का इमरजेंसी अध्याय, चुनाव आयोग की भूमिका और लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा से होंगे छात्र रूबरू
नई दिल्ली। देश के शिक्षा जगत में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। करीब पांच दशक बाद पहली बार NCERT ने कक्षा 9वीं के पाठ्यक्रम में 1975 से 1977 के बीच लगी इमरजेंसी को विस्तार से शामिल किया है। नए सिलेबस में छात्रों को उस दौर के बारे में पढ़ाया जाएगा, जब देश में लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर सबसे बड़ा संकट आया था। NCERT ने इमरजेंसी को भारतीय लोकतंत्र के सामने खड़ी हुई “सबसे बड़ी चुनौतियों” में से एक बताया है।
इस बदलाव के बाद शिक्षा और राजनीति के गलियारों में नई बहस शुरू हो गई है। कुछ लोग इसे इतिहास की महत्वपूर्ण सच्चाई से छात्रों को परिचित कराने वाला कदम बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से भी देख रहे हैं।
इमरजेंसी के दौरान क्या हुआ था?
25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सलाह पर देश में राष्ट्रीय इमरजेंसी लागू की गई थी। इसके बाद कई मौलिक अधिकारों पर रोक लगाई गई, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां हुईं और प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। यह अवधि मार्च 1977 तक चली थी।नए पाठ्यक्रम में छात्रों को बताया जाएगा कि लोकतंत्र में नागरिक अधिकार कितने महत्वपूर्ण होते हैं और संकट के समय संवैधानिक संस्थाओं की क्या भूमिका रहती है।
चुनाव आयोग की भूमिका पर भी फोकस
सिर्फ इमरजेंसी ही नहीं, बल्कि ‘इलेक्टोरल पॉलिटिक्स’ यानी चुनावी राजनीति वाले अध्याय में चुनाव आयोग की भूमिका को भी प्रमुखता से शामिल किया गया है। इसमें बताया जाएगा कि भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने में चुनाव आयोग किस तरह काम करता है और लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखने में उसकी क्या जिम्मेदारी होती है।
लोकतंत्र की ताकत भी पढ़ेंगे छात्र
पाठ्यक्रम में यह भी बताया जाएगा कि इमरजेंसी खत्म होने के बाद 1977 में हुए आम चुनावों में जनता ने मतदान के जरिए अपना फैसला सुनाया और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार सत्ता में आई। इसे भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
क्यों खास है यह बदलाव?
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि नई पीढ़ी को सिर्फ घटनाएं नहीं, बल्कि उनके लोकतांत्रिक प्रभाव भी समझने चाहिए। इमरजेंसी का अध्याय छात्रों को यह समझाने की कोशिश करेगा कि लोकतंत्र में अधिकार, संविधान और स्वतंत्र संस्थाएं क्यों जरूरी हैं।
अब आने वाले शैक्षणिक सत्र से कक्षा 9वीं के छात्र इतिहास के उन पन्नों को पढ़ेंगे, जिन पर दशकों से बहस होती रही है। सवाल यही है कि क्या यह अध्याय छात्रों को लोकतंत्र की नई समझ देगा, या फिर इसके राजनीतिक मायनों पर विवाद और गहराएगा? फिलहाल पूरे देश की नजर NCERT के इस बड़े बदलाव पर टिकी हुई है।









