बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विभागीय जांच की प्रक्रिया को लेकर एक अहम और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ आरोप केवल अनुमान, एकतरफा निष्कर्ष या बिना ठोस साक्ष्य के आधार पर सिद्ध नहीं माने जा सकते। यदि कर्मचारी आरोपों से इनकार करता है, तो विभाग के लिए आवश्यक है कि वह गवाहों के बयान दर्ज करे, दस्तावेजी एवं मौखिक साक्ष्य प्रस्तुत करे और संबंधित कर्मचारी को जिरह का पूरा अवसर दे। इन प्रक्रियाओं का पालन किए बिना की गई विभागीय कार्रवाई कानूनन वैध नहीं होगी।
विभागीय जांच में साक्ष्य अनिवार्य
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी अनुशासनात्मक कार्रवाई में पारदर्शिता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन अनिवार्य है। केवल आरोप पत्र जारी कर देना पर्याप्त नहीं है। जांच प्रक्रिया में ठोस सबूत और निष्पक्ष सुनवाई का अवसर देना जरूरी है।
रिकवरी और अपीलीय आदेश रद्द
न्यायमूर्ति राकेश मोहन पांडेय की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए 1,62,843 रुपये की रिकवरी के आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही बस्तर संभाग के कमिश्नर द्वारा अपील खारिज करने के निर्णय को भी निरस्त कर दिया गया।
दिवंगत कर्मचारी के परिजनों को राहत
अदालत ने राज्य सरकार और संबंधित विभाग को निर्देश दिया है कि दिवंगत ग्राम सहायक लीलाराम जांगड़े के सभी सेवानिवृत्ति लाभ नियमों के अनुसार शीघ्र जारी किए जाएं। यह याचिका उनके पुत्र आशीष जांगड़े द्वारा दायर की गई थी।
17 आरोपों के बाद शुरू हुई थी जांच
मामला दुर्गूकोंदल जनपद पंचायत में पदस्थ रहे ग्राम सहायक से जुड़ा है। वर्ष 2003 में उनके खिलाफ 17 आरोप लगाकर विभागीय जांच शुरू की गई थी। कर्मचारी ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए अपना जवाब प्रस्तुत किया था, लेकिन बिना पर्याप्त साक्ष्य के कार्रवाई आगे बढ़ा दी गई थी।
हाईकोर्ट का संदेश: न्याय प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी
इस फैसले को प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही और निष्पक्ष जांच प्रक्रिया को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। कोर्ट ने दोहराया कि किसी भी कर्मचारी के अधिकारों का उल्लंघन करके की गई कार्रवाई टिकाऊ नहीं हो सकती।










