जांच एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश, मौलिक अधिकारों की रक्षा पर जोर
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जांच एजेंसियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि किसी भी व्यक्ति को नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ एग्जामिनेशन, ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफाइल (BEAP) टेस्ट या इसी तरह की किसी भी वैज्ञानिक जांच के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे परीक्षण केवल संबंधित व्यक्ति की स्वेच्छा और विधिसम्मत सहमति के आधार पर ही किए जा सकते हैं।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने यह आदेश पारित करते हुए संबंधित याचिका को निराकृत कर दिया।
रायगढ़ हत्या केस से जुड़ा है मामला
यह प्रकरण रायगढ़ जिले के चक्रधरनगर थाना क्षेत्र में दर्ज एक हत्या और साक्ष्य छिपाने के मामले से संबंधित है। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1) और 238(A) के तहत अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी।
जांच के दौरान संदेह के आधार पर लक्ष्मीनारायण पटेल (किसान, ग्राम बेहरापाली) और अर्धना भगत (गृहिणी, ग्राम महापल्ली) को पूछताछ के लिए बुलाया गया था।
याचिकाकर्ताओं के गंभीर आरोप
दोनों याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में दायर याचिका में आरोप लगाया कि उनका नाम एफआईआर में नहीं है और उनके खिलाफ कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य भी नहीं है। इसके बावजूद उन्हें लगभग 18 दिनों तक पुलिस स्टेशन बुलाकर पूछताछ की गई।
याचिका में यह भी कहा गया कि उन्हें बिना किसी कानूनी नोटिस के हिरासत जैसी स्थिति में रखा गया और दबाव बनाकर दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए। साथ ही उनके मोबाइल फोन भी बिना किसी सीज़र मेमो के जब्त किए गए।
आरोप यह भी लगाया गया कि पुलिस ने बिना न्यायालय की अनुमति और बिना सहमति के उन्हें नार्को-एनालिसिस, पॉलीग्राफ और BEAP टेस्ट के लिए रायपुर में पेश होने के लिए दबाव बनाया।
कोर्ट का स्पष्ट रुख
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जांच एजेंसियां किसी भी व्यक्ति को इन वैज्ञानिक परीक्षणों के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं। यदि इन परीक्षणों की आवश्यकता हो, तो यह केवल स्वतंत्र और स्पष्ट सहमति के आधार पर ही संभव है।
कोर्ट ने कहा कि सहमति सक्षम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज होनी चाहिए और यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के ‘सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य’ फैसले तथा NHRC दिशानिर्देशों के अनुरूप होनी चाहिए।
मानवाधिकारों पर जोर
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के प्रावधानों का पालन अनिवार्य है और किसी भी जांच प्रक्रिया में व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जांच एजेंसियां तकनीकी जांच के नाम पर किसी पर दबाव नहीं बना सकतीं।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने याचिका को समाप्त कर दिया और जांच एजेंसियों को कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई करने के निर्देश दिए।










