18 दिनों तक पूछताछ का आरोप
बिलासपुर| छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में दायर याचिका में दो लोगों ने आरोप लगाया कि उन्हें हत्या की जांच के नाम पर लगातार 18 दिनों तक थाने बुलाया गया। इस दौरान घंटों तक बैठाकर पूछताछ की गई और नार्को, पॉलीग्राफ व ब्रेन मैपिंग टेस्ट कराने का दबाव बनाया गया, जबकि वे एफआईआर में नामजद भी नहीं थे।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसकी स्वैच्छिक और सूचित सहमति के बिना नार्को, पॉलीग्राफ या ब्रेन मैपिंग टेस्ट के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसी कार्रवाई संविधान में मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
पुलिस को दी स्पष्ट हिदायत
अदालत ने जांच एजेंसी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं पर किसी भी प्रकार का दबाव या जबरदस्ती न की जाए। यदि भविष्य में ऐसे टेस्ट की आवश्यकता हो, तो वह केवल कानून के अनुसार, न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित व्यक्ति की स्पष्ट सहमति के बाद ही कराए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का भी हवाला
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के Selvi बनाम State of Karnataka (2010) फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि जबरन नार्को या पॉलीग्राफ टेस्ट कराना व्यक्ति के आत्मदोष स्वीकार न करने के अधिकार और निजता के अधिकार का उल्लंघन है।
मामले का महत्व
इस फैसले के बाद स्पष्ट हो गया है कि जांच एजेंसियां वैज्ञानिक जांच के नाम पर किसी भी व्यक्ति पर दबाव नहीं बना सकतीं। अदालत ने दोहराया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और जांच के दौरान भी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है।











