छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा—ऐसे अपराध पीड़िता के मानसिक संतुलन को गहराई से प्रभावित करते हैं
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट) ने दुष्कर्म पीड़िता की आत्महत्या से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण और संवेदनशील टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म जैसी जघन्य घटनाएं महिला की गरिमा और मानसिक संतुलन को गहराई से प्रभावित करती हैं, जिससे वह गंभीर मानसिक पीड़ा और सामाजिक ग्लानि का सामना करती है।
सामाजिक दबाव और मानसिक पीड़ा बन सकती है आत्महत्या का कारण
न्यायालय ने अपने अवलोकन में कहा कि ऐसे गंभीर अपराधों के बाद पीड़िता के लिए समाज का सामना करना बेहद कठिन हो जाता है। लगातार मानसिक दबाव, भय और सामाजिक कलंक कई बार पीड़िता को आत्मघाती कदम उठाने के लिए मजबूर कर सकता है।यह टिप्पणी जस्टिस एनके व्यास की सिंगल बेंच ने बलौदाबाजार-भाटापारा जिले के कसडोल थाना क्षेत्र में वर्ष 2004 में दर्ज एक मामले की सुनवाई के दौरान की।
आरोपी की अपील खारिज, 10 वर्ष की सजा बरकरार
कोर्ट ने आरोपी विजय कुमार वर्मा की ओर से दायर आपराधिक अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 10 वर्ष की सजा को यथावत रखा है।न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में अपराध की गंभीरता को कम करके नहीं आंका जा सकता। साथ ही पीड़िता पर पड़ने वाले मानसिक और सामाजिक प्रभाव को न्यायिक दृष्टि से गंभीरता से देखा जाना आवश्यक है।
न्यायिक टिप्पणी का महत्व
इस फैसले को महिला सुरक्षा और न्याय व्यवस्था के दृष्टिकोण से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत की टिप्पणी ने यह भी स्पष्ट किया कि यौन अपराध केवल शारीरिक नुकसान तक सीमित नहीं होते, बल्कि इनके गहरे मानसिक और सामाजिक प्रभाव भी होते हैं।








