जगदलपुर|बस्तर के जंगलों में नक्सल मोर्चे पर तैनात जवानों के पसीने की कमाई जहां एक-एक पैसे के लिए तरसती है, वहीं उसी पुलिस महकमे के भीतर एक ऐसा ‘दीमक’ लगा हुआ था जो चुपचाप सरकारी खजाने को खोखला कर रहा था। किसी को कानों-कान खबर नहीं थी कि जो हाथ कानून की रक्षा के लिए उठे हैं, वही हाथ हर महीने डिजिटल फाइलों में हेराफेरी कर करोड़ों रुपये अपनी जेबों में डाल रहे हैं। यह कहानी किसी शातिर ठग की नहीं, बल्कि खाकी वर्दी पहने उन तीन कांस्टेबलों की है, जिन्होंने सिस्टम की आंखों में धूल झोंककर 2 करोड़ रुपये का वेतन घोटाला कर डाला।
सिस्टम की नाक के नीचे ‘मास्टरमाइंड’ का खेल
इस पूरे खेल का केंद्र था जगदलपुर स्थित बस्तर पुलिस अधीक्षक (SP) कार्यालय का ‘सैलरी सेक्शन’ (वेतन शाखा)। साल 2012 से अनुकंपा नियुक्ति पर पदस्थ कांस्टेबल गिरीश राय को इस शाखा का सहायक बनाया गया था। गिरीश को डिजिटल सैलरी रिकॉर्ड्स और सॉफ्ट कॉपियों को प्रोसेस करने की पूरी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। बस, इसी भरोसे को गिरीश ने अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया।
अक्टूबर 2023 से मई 2026 के बीच, जब भी सैलरी बिल फाइनल होने के लिए ट्रेजरी (कोषालय) भेजे जाते, गिरीश बड़ी चालाकी से सॉफ्टवेयर में जाकर अपनी और अपने दो अन्य साथी कांस्टेबलों — राजकुमार कतलाम और हेमंत मैथ्यू — की सैलरी को कई गुना बढ़ा देता। बिल पास होते ही बढ़ा हुआ पैसा सीधे उनके बैंक खातों में ट्रांसफर हो जाता।
लोन के नाम पर दूसरों को भी घसीटा
जांच में यह भी सामने आया है कि गिरीश राय का लालच सिर्फ तीन खातों तक सीमित नहीं था। उसने विभाग के कुछ अन्य भोले-भाले या संलिप्त कर्मचारियों को अपने जाल में फंसाया। वह उनके खातों में भी फर्जी तरीके से बढ़ी हुई सैलरी डाल देता और बाद में उनसे कहता, “यह विभाग की तरफ से आपको लोन दिया गया है।” इसके बाद वह उस अतिरिक्त रकम को उन कर्मचारियों से कैश (नकद) के रूप में वापस ले लेता था। पुलिस अब इन ‘फर्जी लोन’ के शिकार हुए कर्मचारियों से भी कड़ी पूछताछ कर रही है।
ट्रांसफर-पोस्टिंग की आड़ में छिपता रहा सच
सवाल यह उठता है कि लगभग तीन साल तक इतना बड़ा घोटाला किसी की नजर में क्यों नहीं आया? पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, पुलिस विभाग में लगातार होने वाले ट्रांसफर, पोस्टिंग और नई भर्तियों के कारण हर महीने सैलरी का कुल खर्च ऊपर-नीचे होता रहता है। ऑडिटर्स को लगता था कि बजट में यह उतार-चढ़ाव सामान्य है। इसी प्रशासनिक ‘लूपहोल’ (कमजोरी) का फायदा उठाकर तीनों आरोपी हर महीने छोटी-छोटी किस्तें बढ़ाकर सरकारी खजाना उड़ाते रहे।
इंसानी आंखें चूकीं, पर AI ने पकड़ा झूठ
कहते हैं कि जुर्म कितना भी शातिर क्यों न हो, एक न एक दिन सुराग छोड़ ही जाता है। इस बार यह सुराग किसी इंसान ने नहीं, बल्कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने पकड़ा।
नियमित आंतरिक और बाहरी ऑडिट के दौरान जब सामान्य तौर पर सब कुछ ठीक लग रहा था, तब विभाग के AI-असिस्टेड वित्तीय ऑडिट टूल ने सैलरी खर्च में एक असामान्य और डरावना ‘स्पाइक’ (उछाल) फ्लैग किया। AI ने पकड़ लिया कि जितने कर्मचारी ऑन-ड्यूटी हैं, उनके मुकाबले खर्च की जा रही रकम का गणित मैच नहीं खा रहा है।
“जब AI ऑडिट ने इस विसंगति को उजागर किया, तो हमारी टीम ने गहराई से जांच शुरू की। शुरुआती पूछताछ में ही मास्टरमाइंड गिरीश राय टूट गया और उसने अपना जुर्म कबूल कर लिया।”
— शलभ कुमार सिन्हा, पुलिस अधीक्षक, बस्तरअदालत का फैसला और आगे की जांच
बस्तर पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए तीनों आरोपी कांस्टेबलों को गिरफ्तार कर लिया है। उनके खिलाफ जगदलपुर थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी, आपराधिक विश्वासघात और सरकारी धन के गबन की गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। स्थानीय अदालत ने तीनों को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है।
फिलहाल, पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इस 2 करोड़ के घोटाले की जड़ें कितनी गहरी हैं और क्या विभाग के कुछ बड़े अधिकारियों या बैंक कर्मियों की मौन सहमति भी इस खेल में शामिल थी।










