दोपहर का वो सन्नाटा और रहस्यमयी गुमशुदगी
पुणे (महाराष्ट्र)|यह कहानी 1 मई 2026 की है। गर्मी की छुट्टियां बिताने अपनी नानी के घर आई एक 3 साल की मासूम बच्ची घर के बाहर खेल रही थी। दोपहर के करीब 3 बज रहे थे। अचानक, वह बच्ची हवा की तरह गायब हो गई। परिजन परेशान हो गए, गलियां छानी गईं, आवाजें लगाई गईं, लेकिन हर तरफ सिर्फ खामोशी थी। किसी को अंदाजा नहीं था कि चंद कदमों की दूरी पर स्थित एक मवेशी शेड (गौशाला) के भीतर क्या भयानक साजिश अंजाम दी जा चुकी थी।
39 मिनट का खौफनाक सच और सीसीटीवी का सुराग
जब तलाश थकी, तो नजरें इलाके के एक सीसीटीवी कैमरे पर गईं। फुटेज की टाइमलाइन ने पुलिस के होश उड़ा दिए:
- दोपहर 3:12 बजे: 65 साल का बुजुर्ग भीमराव कांबले उस मासूम बच्ची को बहला-फुसलाकर आगे ले जाता हुआ दिखा। उसने बच्ची को चिप्स दिलाने और गाय का नवजात बछड़ा दिखाने का लालच दिया था।
- दोपहर 3:51 बजे: ठीक 39 मिनट बाद, वही बुजुर्ग उसी रास्ते से अकेला वापस लौट रहा था।
इन 39 मिनटों के भीतर उसवानव ने मवेशी शेड के अंधेरे में बच्ची के साथ दरिंदगी की और उसकी चीखें दबाने के लिए उसका गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। इतना ही नहीं, पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि आरोपी ने हत्या के बाद भी मासूम के शव के साथ बर्बरता की थी।
जन-आक्रोश की आग और 16 दिन में चार्जशीट
जैसे ही बच्ची का लहूलुहान शव मवेशी शेड से बरामद हुआ, पुणे सुलग उठा। गुस्साए ग्रामीणों ने पुणे-बेंगलुरु हाईवे को जाम कर दिया। पुलिस प्रशासन पर दबाव इतना था कि पुणे ग्रामीण पुलिस ने बिना एक पल गंवाए त्वरित कार्रवाई की। पुलिस ने महज 16 दिनों के भीतर कोर्ट में 1,100 पन्नों की पुख्ता चार्जशीट दाखिल कर दी।
कोर्ट रूम का सस्पेंस: “अब सीधे फांसी के फंदे पर जाओ”
मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे विशेष फास्ट-ट्रैक पॉक्सो (POCSO) कोर्ट में चलाया गया। सरकारी वकील अजय मिसर ने अदालत के सामने सुप्रीम कोर्ट के 12 ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए इसे ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) मामला बताया।
29 जून 2026 को खचाखच भरे कोर्ट रूम में सन्नाटा पसरा हुआ था। आरोपी भीमराव कांबले कटघरे में खड़ा था। उसे उम्मीद थी कि उसकी उम्र (65 वर्ष) को देखते हुए शायद कोर्ट रहम बरतेगा। लेकिन विशेष न्यायाधीश एस. आर. सालुंखे ने फैसला सुनाते हुए कहा:
“इस जघन्य अपराध ने न केवल न्यायिक बल्कि सामाजिक अंतरात्मा को भी झकझोर कर रख दिया है। आरोपी का पिछला आपराधिक इतिहास रहा है और उसमें सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। उम्र कोई ढाल नहीं हो सकती।”
न्यायाधीश ने आरोपी की तरफ देखते हुए कड़े शब्दों में कहा— “अब सीधे फांसी के फंदे पर जाओ।”
60 दिन में न्याय की मिसाल
यह भारतीय न्यायिक इतिहास के सबसे तेज फैसलों में से एक बन गया। वारदात के ठीक 60 दिनों के भीतर (25 जून को दोषी करार और 29 जून को सजा) अदालत ने तीन अलग-अलग धाराओं (हत्या, बलात्कार और पॉक्सो एक्ट) के तहत तीन बार फांसी की सजा सुनाई। फैसला सुनते ही कोर्ट रूम में मौजूद पीड़िता के माता-पिता की आंखों से आंसू छलक पड़े, जिन्होंने पुलिस टीम को तुरंत न्याय दिलाने के लिए धन्यवाद दिया। खुद आरोपी के परिवार और रिश्तेदारों ने उसकी इस करतूत के बाद उससे नाता तोड़ लिया था और कोर्ट में कोई उसका पक्ष लेने नहीं आया।









