32 पार्षदों के प्रस्ताव को अदालत ने बताया कानूनी रूप से अमान्य
भिलाई | भिलाई नगर निगम में कमिश्नर को हटाने को लेकर चल रही सियासी और प्रशासनिक खींचतान पर आखिरकार हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुना दिया। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि केवल बहुमत से पारित प्रस्ताव किसी अधिकारी को पद से हटाने का आधार नहीं बन सकता। कानून सर्वोपरि है और उसी के अनुसार निर्णय होगा। इसी टिप्पणी के साथ कमिश्नर को हटाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी गई।
32 पार्षदों ने पास किया था प्रस्ताव
मामला तब शुरू हुआ जब नगर निगम की सामान्य सभा में 32 पार्षदों ने निगम कमिश्नर को हटाने का प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव के आधार पर महापौर और पार्षदों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए मांग की कि राज्य सरकार को कमिश्नर को हटाने का निर्देश दिया जाए।
कोर्ट ने क्यों खारिज कर दी याचिका?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि नगर निगम की सामान्य सभा का प्रस्ताव अपने आप में किसी आयुक्त को हटाने का वैधानिक अधिकार नहीं देता। अदालत ने माना कि संबंधित कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जिसके तहत केवल बहुमत के आधार पर कमिश्नर को पद से हटाया जा सके। इसलिए पार्षदों का प्रस्ताव कानूनी रूप से प्रभावी नहीं माना जा सकता।
कमिश्नर को मिली बड़ी राहत
फैसले के बाद निगम कमिश्नर को बड़ी राहत मिली है। वे फिलहाल अपने पद पर बने रहेंगे और पहले की तरह प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाते रहेंगे। अदालत के फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया कि प्रशासनिक नियुक्तियों और हटाने की प्रक्रिया कानून के दायरे में ही होगी।
सियासी गलियारों में तेज हुई चर्चा
हाईकोर्ट के फैसले के बाद भिलाई की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों इस फैसले को अपने-अपने नजरिए से देख रहे हैं। वहीं कानूनी जानकारों का कहना है कि यह फैसला भविष्य में स्थानीय निकायों के लिए भी एक महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है, क्योंकि इससे स्पष्ट संदेश गया है कि लोकतांत्रिक बहुमत भी कानून से ऊपर नहीं हो सकता।










