प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के उल्लंघन पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ग्राम रोजगार सहायक को बिना कारण बताओ नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए सेवा से हटाने की कार्रवाई को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बताते हुए निरस्त कर दिया है। हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को याचिकाकर्ता को आर्थिक लाभ देने के भी निर्देश दिए हैं।
कथित अनियमितताओं के आरोप में हटाया गया था कर्मचारी
मामला बिलासपुर जिले के जनपद पंचायत तखतपुर अंतर्गत ग्राम पंचायत जरौंधा में पदस्थ ग्राम रोजगार सहायक नीता बाई डाहीरे से जुड़ा है। उन्हें कथित अनियमितताओं और फर्जी मस्टर रोल तैयार करने के आरोप में सेवा से हटा दिया गया था।
याचिकाकर्ता ने उठाया प्रक्रिया में त्रुटि का मुद्दा
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्रीकांत कौशिक ने अदालत को बताया कि सेवा समाप्ति से पहले न तो कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और न ही अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया कि सेवा समाप्ति आदेश जारी होने के लगभग तीन माह बाद नोटिस जारी किया गया, जो प्रशासनिक प्रक्रिया की गंभीर खामी को दर्शाता है।
राज्य शासन की दलील नहीं आई काम
सुनवाई के दौरान राज्य शासन और जनपद पंचायत तखतपुर की ओर से कार्रवाई को उचित ठहराने का प्रयास किया गया। उनका कहना था कि आरोपों के आधार पर सेवा समाप्ति की गई थी, लेकिन अदालत ने पाया कि यह आदेश कलंककारी (स्टिग्मैटिक) प्रकृति का था और ऐसे मामलों में कर्मचारी को पहले सुनवाई का पूरा अवसर देना अनिवार्य है।
आर्थिक लाभ देने के निर्देश
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना की गई कोई भी प्रशासनिक कार्रवाई विधिसम्मत नहीं मानी जा सकती। अदालत ने सेवा समाप्ति आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को नियमानुसार आर्थिक लाभ प्रदान करने के निर्देश भी दिए हैं।
प्रशासनिक कार्रवाई के लिए बना महत्वपूर्ण नजीर
हाईकोर्ट के इस फैसले को प्रशासनिक मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की अनिवार्यता को रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है। यह फैसला स्पष्ट करता है कि किसी भी कर्मचारी के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई से पहले उसे अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देना आवश्यक है।







